( साभार: ओंकार नाथ )
इजराइल की पुकार
75 साल पहले हमें मरने के लिए लाया गया, हमारे पास ना कोई देश था, ना कोई सेना थी, सात मुल्कों ने हमारे विरुद्ध जंग छेड़ दी, हम सिर्फ 65000 थे, हमें बचाने के लिए कोई नहीं था, हम पर हमले होते रहे, होते रहे।
लेबनान, सीरिया, इराक, जॉर्डन, मिस्र, लीबिया, सऊदी अरब जैसे कई मुल्क हमारे ऊपर कोई दया नहीं दिखाई।
सभी लोग हमें मारना चाहते थे किंतु हम बच गये।
संयुक्त राष्ट्र ने हमें जमीन दी, वह जमीन जो 65 प्रतिशत रेगिस्तान था, हमने उस जमीन को भी अपने खून से सींचा, हमने उसे ही अपना देश माना क्योंकि वही हमारे लिए वही सब कुछ था।
हम कुछ नहीं भूले, हम फिरौन से बच गए, हम यूनान से बच गए, हम रोमन से बच गए, हम स्पेन से बच गए, हम हिटलर से बच गए, हम अरब देशों से बच गए, हम सद्दाम से बच गए, हम गद्दाफी से बच गए, हम हमास से भी बचेंगे, हम हिजबुल्ला से भी बचेंगे और हम ईरान से भी बचेंगे।
हमारे जेरूसलम पर अब तक 52 बार आक्रमण किया गया, 23 बार घेरा गया, 39 बार तोड़ा गया, तीन बार बर्बाद किया गया, 44 बार कब्जा किया गया लेकिन हम अपने जेरूसलम को कभी भूल नहीं, वह हमारे हृदय में है, वह हमारे मस्तिष्क में है और जब तक हम रहेंगे, जेरूसलम हमारे आत्मा में रहेगा।
दुनिया यह याद रखें जिन्होंने हमें बर्बाद करना चाहा वह आज स्वयं नहीं है। मिश्र, लेबनान, बेबीलोन, यूनान, सिकंदर, रोमन सब खत्म हो गए हो।
हम फिर भी जिंदा बचे रहे।
हमें वे खत्म करना चाहते हैं, उन्होंने हमारे रस्म रिवाज को कब्जाया, उन्होंने हमारे उपदेशों को कब्जाया। उन्होंने हमारे परंपरा को कब्जाया, उन्होंने हमारे पैगंबर को कब्जाया, फिर कुछ समय पश्चात अब्राहम इब्राहिम कर दिए गए, सोलोमन सुलेमान हो गए, डेविड दाऊद बना दिए गए, मोजेज मूसा कर दिए गए…
फिर एक दिन… उन्होंने कहा तुम्हारा पैगंबर आ गया है, हमने इसे नहीं स्वीकार नहीं क्या, करते भी कैसे, उनके आने का समय नहीं आया था, उन्होंने कहा, स्वीकारो ! कबूल लो ! हमने नहीं कबूला, फिर हमें मारा गया, हमारे शहरों को कब्जाया गया, हमारे शहर यथरीब को मदीना बना दिया गया, हम कत्ल हुए, भगा दिए गए…
मक्का के काबा में हम 2 लाख थे, मार दिए गए। हमें दुश्मन बता कर कतल किया गया, फिर सीरिया में, ओमान में यही हुआ। हम तीन लाख थे, मार दिए गए। इराक में हम 2 लाख थे, तुर्की में चार लाख, हमें मारा जाता रहा, मारा जाता रहा। वे हमें मार रहे हैं, मारते जा रहे हैं। हमारे शहर, धन, दौलत, घर, पशु, मान सम्मान सब कुछ कब्जाए जाते रहे फिर भी हम बचे रहे।
1300 सालों में हम 27 करोड़ यहूदियों को मारा गया फिर भी हम बचे…
75 साल पहले वे हम पर थूकते थे, जलील करते थे, मरते थे, हमारी नियति यही थे किंतु हम स्वयं पर, अपने नेतृत्व पर, अपने विश्वास पर टिके रहे रहे।
आज हमारे पास एक अपना देश है। एक खुद की सेना है, एक छोटी अर्थव्यवस्था है। इंटेल, माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, फेसबुक, जैसी कई संस्था हमने इस दौर में बनाई। आज हमारे चिकित्सक दवा बन रहे हैं, लेखक किताबें लिख रहे हैं, यह सब के लिए है, यह मानवता के कल्याण के लिए है।
हमने रेगिस्तान को हरियाली में बदला, हमारे फल, दवाएं, उपकरण, उपग्रह सभी के लिए है।
हम किसी के दुश्मन नहीं है, हमने किसी को खत्म करने की कसमें नहीं खाई, हमें किसी को बर्बाद भी नहीं करना, हम साजिशें भी नहीं करते।
हम जीना चाहते हैं, सिर्फ सम्मान से, अपने देश में, अपनी जमीन में, अपने घर में।
पिछले हजार सालों से हमें मिटाया गया, खदेड़ा गया, कब्जाया जाता रहा, हम मिटे नहीं, हारे नहीं और न अभी हारेंगे। हम जीतेंगे, हम जीत कर रहेंगे, हम 3000 सालों से यरुशलम में ही थे, आज हम पहले देश इजराइल में है, यह हमारा ही था, हमारा ही है और हमारा ही रहेगा, येरूसलम हमसे है और हम येरूसलम से है… आमीन (मेरी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक का एक अध्याय जो बेंजामिन नेतन्याहू के भाषणों पर आधारित है)।
( साभार: ओंकार नाथ )



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