
एक बार एक बड़ा सेठ बड़े विचलित मन से अपने गुरु के पास गया।
सेठ :
गुरु जी, सारे संसार का सुख मेरे पास है, धन है, अच्छा व्यवसाय है, प्यारा सा परिवार है, सारे बच्चे भी अपने जीवन में सफलता पूर्वक बढ़ रहे है, समाज में प्रतिष्ठा भी है । पर मेरा मन है कि हमेशा भयभीत रहता है और विकारों से भरा रहता है – कुछ ना कुछ नकारात्मक विचार मुझे विचलित करते रहते हैं ।
गुरु जी कृपया कोई उपाय बताएं – मुझे शांति मिले ऐसी कोई क्रिया बताएं… ।
गुरुजी एक पल रुके, कुछ सोचा और बोले :
वत्स ! मुझे तुम्हारी उलझन कि वजह तो पता नहीं, ना ही मैं सांसरिक व्यवहार के बारे में कुछ जानता हूँ, इसीलिए ऐसी कोई क्रिया या उपाय तो नहीं बता सकता ।
हाँ परंतु, में तुम्हें देखकर इतना कह सकता हूँ कि अब तुम्हारा आयुष्य पुर्ण होने में कुछ ही समय बचा है और ज्यादा से ज्यादा तुम सात या दस दिन ही जीवित रहोगे ।
सेठ घबरा गया और बड़े ही उदास मन से गुरुजी को प्रणाम कर रूआँसे मन से घर गया ।
दस दिन बीत गए , सेठ कुछ लोगों को साथ लेकर , बड़े ही गुस्से से और अभिमान के साथ गुरुजी के आश्रम पहुँचा और बड़ी सख्ती के साथ गुरुजी से बोला :
गुरुजी आप तो बड़े ही धूर्त निकले, आपने मुझे गलत भविष्यवाणी करके भेजा था , और देखिये इन दस दिनों में मुझे कुछ भी नहीं हुआ और में एकदम स्वस्थ और तंदुरुस्त हाल में आपके सामने खड़ा हूँ !! आपसे ऐसे झूठ की अपेक्षा नहीं थी ।
गुरुजी मंद मंद मुस्कुराए और बोले :
हे वत्स, बड़ी ही अच्छी बात है कि, मैं गलत साबित हुआ और तुम्हें इन दिनों में बिलकुल कुछ नहीं हुआ ।
पर मुझे बतायो, तुम्हारी उस समस्या का क्या हुआ, कोई हल निकला ? तुम्हारी भय और विकारग्रस्त मन की परेशानी दूर हुई ??
सेठ को और गुस्सा आया और रूखे अंदाज में बोला :
इन दिनों आपने मुझे इतना डरा दिया था, मेरी मौत कि भविष्यवाणी आपने की थी – मेरा सारा समय मैंने अपने परिवार, व्यवसाय और समाज के अधूरे काम पूरा करने में लगाना पड़ा । अपने बारे में सोचने का समय कहाँ था , अपनी पत्नी और बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना था , व्यवसाय के सारे अधूरे काम पूरे करने पड़े । मेरा पूरा समय इन बातों में ही बीत गया – मुझे विकारों और नकारात्मक बातों में बारे में समय ही कहाँ था ??
गुरु जी ने सुना और फिर से मुस्कुराने लगे !! बिना कुछ बोले सेठ के सर पर हाथ रखा और आशीवाद देकर वह वहाँ से चलने लगे ।
बताने की जरूरत नहीं है कि, सेठ को अपने कथन के बाद और गुरुजी कि सौम्य मुस्कुराहट देखकर अन्तर्ज्ञान हुआ और अपनी समस्या भी समझ आई, जो वाकई समस्या थी ही नहीं…..!!!
हम ज़िंदगी भर अकल्पनीय समस्याओं के साथ झुझते रहते हैं , क्यूंकी अपनी अभिलाषायों, उम्मीद एवं इच्छायों के बीच तारतम्य नहीं बैठा पाते… जो सच है, जो सही है, उस को जान कर भी अंजान बना देते हैं ।
सुख यानी आनंद को हमने सही से नहीं समझा, इसीलिए उसके पीछे गलत जगहों , गलत वजहों और गलत तरीकों से भागते रहते है, परिणामस्वरूप हम हमेशा दुखी रहते हैं और नकारात्मक्ता हमें वर्तमान समय के जीवन का आनंद नहीं लेने देती ।
बीते कल का बोझ ना ढोएँ – आनेवाले कल की जरूर सोचे पर उस वजह से वर्तमान जीवन को जीना ना भुलें – आज जीयें, भरपुर जीयें , आनंद से जीयें, स्वस्थ्य रहें …. !!
याद रखें ! सुख इस तितली की तरह है, जितना इसके पीछे भागेंगे वो उतना ही दूर उड़ेगी, जैसे ही आप स्थिर हो जाएँगे, वो अपने आप आपके कंधों पर आकर बैठ जाएगी !!


Ji bahut sahi likha aapne .Sukh toh bheetar hi paya jata hai .
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Thank you !
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