सुख और सुकून
आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हम सभी सुख की तलाश में भागते हैं — ज़्यादा पैसा, बड़ा घर, अच्छी गाड़ी, ऊँचा पद। लेकिन फिर भी मन बेचैन रहता है। यही सुख और सुकून में फर्क है।
सुख बाहरी चीज़ों से मिलता है।
नई चीज़ खरीदने पर, तारीफ़ मिलने पर, या सफलता मिलने पर मन खुश होता है।
लेकिन ये खुशी थोड़ी ही देर रहती है, फिर और कुछ चाहिए।
सुकून भीतर से आता है।
जब मन शांत और संतोषित होता है, तब सुकून मिलता है।
यह बाज़ार या संपत्ति से नहीं आता, बल्कि अपने भीतर झाँकने से पाया जाता है।
अक्सर जो लोग कम चीज़ों के मालिक होते हैं पर उनका मन शांत होता है, वे ज़्यादा आनंदित रहते हैं।
जबकि जिनके पास बहुत कुछ है पर उनकी इच्छाएँ अनंत हैं, वे बेचैन महसूस करते हैं।
सच्चाई यह है कि : सुख चीज़ों से जुड़ा है, और सुकून सोच से।
अगर हम अपनी उम्मीदें कम रखें, दूसरों से तुलना न करें, और जो हमारे पास है उसके लिए आभारी रहें, तो सुकून मिलेगा। जब रात को सोते समय मन हल्का हो, किसी से शिकायत न हो, और दिल में द्वेष न हो, तो सुकून आ गया।
जीवन का लक्ष्य केवल सुख जुटाना नहीं, बल्कि सुकून पाना होना चाहिए।
सुख बिना सुकून के बोझ बन जाता है, और सुकून के साथ थोड़ा सुख भी जीवन को सुंदर बना देता है।



