
दहेज एक अभिशाप
एक थे मुन्शी लाल चौबे खानदानी हलवाई।अच्छी दुकान चलती थी।थे तो हलवाई लेकिन बेटे अशोक को पढ़ाई की ऐसी लग्न लगाई कि लगातार प्रथम रहते हुए बेटे ने एम एस सी की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली।
चौबे जी ने एक दिन चौबन जी से विचार विमर्श किया, “अशोक की नौकरी तो लग ही जाएगी और नहीं भी लगी तो अपना धन्धा तो बढ़िया चल ही रहा है क्यों न अशोक का ब्याह कर दिया जाय।”
चौबन अभी तैयार न थी। बोली,”ब्याह तो नौकरी के बाद ही करें तभी अच्छा दहेज अच्छी लड़की मिलेगी।”
लेकिन चौबे जी के मन में जो एक बार जो बात आई तो जैसे तैसे चौबन को बेटे के ब्याह के लिए राजी कर ही लिया।
पड़ौसी शहर के ही मिश्रा जी की लड़की थी ममता, वह भी एमए पहले दर्जे में पास थी, मिश्रा भी उसकी शादी जल्दी कर देना चाहते थे।
सयानों से पोस्ट ग्रेजुएट लड़के का भाव पता किया गया। पता चला वैसे तो रेट पांच से छः लाख का चल रहा है, पर बेकार बैठे पोस्ट ग्रेजुएटों का रेट तीन से चार लाख का है।
सयानों ने आखिर चौबे जी से ही सौदा साढ़े तीन में तय करा दिया।
अशोक और ममता की सगाई बड़े धूमधाम से कर दी गई।
सगाई हुए अभी एक माह भी नही हुआ,कि कमीशन से पत्र आया कि, अशोक का डिप्टी कलक्टर के पद पर चयन हो गया है।
पत्र पढ़ते ही चौबे जी लगे बड़बड़ाने- “साले, नीच, कमीने… हरामजादे हैं कमीशन वाले…!”
चौबन जी हैरान परेशान पूछने लगी, “लड़के की इतनी अच्छी नौकरी लगी है नाराज क्यों होते हैं?”
चौबे जी बोले,”अरे सरकार निकम्मी है, मैं तो कहता हूँ इस देश में क्रांति होकर रहेगी… यही पत्र कुछ दिन पहले नहीं भेज सकते थे, डिप्टी कलेक्टर का 40-50 लाख यूँ ही मिल जाता।” अब तो चौबन भी समझ गई काहे चौबे परेशान हैं।
कहने लगी,”तुम्हारी भी अक्ल मारी गई थी, मैं न कहती थी महीने भर रुक जाओ, लेकिन तुम न माने… हुल-हुला कर सम्बन्ध तय कर दिया… मैं तो कहती हूँ मिश्रा जी को पत्र लिखिये वे समझदार आदमी हैं।”
चौबन से सलाह मशवरा कर भेज दिया पत्र मिश्रा जी को…..
प्रिय मिश्रा जी,
अत्र कुशलं तत्रास्तु!
आपको प्रसन्नता होगी कि अशोक का चयन डिप्टी कलेक्टर के लिए हो गया है। विवाह के मंगल अवसर पर यह मंगल हुआ। इसमें आपकी सुयोग्य पुत्री के भाग्य का भी योगदान है।
आप स्वयं समझदार हैं, नीति व मर्यादा जानते हैं। धर्म पर ही यह पृथ्वी टिकी हुई है। मनुष्य का क्या है, जीता मरता रहता है। पैसा हाथ का मैल है, मनुष्य की प्रतिष्ठा बड़ी चीज है। मनुष्य को कर्तव्य निभाना चाहिए, धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। और फिर हमें तो कुछ चाहिए नहीं, आप जितना भी देंगे अपनी लड़की को ही देंगे
मिश्रा परिवार ने पत्र पढ़ा, विचार किया और फिर लिखा-
प्रिय चौबे जी, आपका पत्र मिला, मैं स्वयं आपको लिखने वाला था। अशोक की सफलता पर हम सब बेहद खुश हैं। आयुष्मान अब डिप्टी कलेक्टर हो गया हैं। अशोक चरित्रवान, मेहनती और सुयोग्य लड़का है। वह अवश्य तरक्की करेगा।
आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि ममता का चयन आईएएस के लिए हो गया है।
आयुष्मति की यह इच्छा है कि अपने अधीनस्थ कर्मचारी से वह विवाह नहीं करेगी।
मुझे यह सम्बन्ध तोड़कर अपार हर्ष हो रहा है।
पत्र पाकर चौबे जी की हालत क्या हुई होगी इसकी कल्पना हम कर ही सकते हैं।
आईये दहेज की इस कुप्रथा को समाप्त करने के संकल्प के साथ शुरुआत करें


JAISE KO TAISA
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