
काक स्पर्श…
(सौजन्य : @bhagwa_sonam)
अपने कमरे में अकेले बैठे दीनानाथ जी की नजरें बार बार बाहर हॉल की ओर जा रही हैं। पूरे घर में सुस्वादु भोजन की महक फैल रही है।
अपनी माँ के श्राद्ध कर्म में ब्राह्मण भोज का भोजन पकाने हेतु विशाल ने विशेष रूप से महाराज को बुलवाया है !
पूरी, कचौड़ी,दही बड़े,खीर,पुआ,भजिए और अनेक प्रकार की सब्जियाँ बनवाई जा रही हैं।
रोज नाश्ते में मिलने वाले बेस्वाद कॉर्नफ्लेक्स और दूध के भी दर्शन नहीं हुए आज अभी तक!
दवा लेना है, भूख से आँते कुलबुला रही हैं। यूँ भी मधुमेह के रोगी के लिए भूखे रह पाना असह्य होता है।
रेवती की तस्वीर लेने विशाल कमरे में आया तो उन्होंने कुछ खाने की इच्छा जाहिर की।
“क्या पिताजी! आज माँ के नाम से थोड़ी देर भूखे नहीं रह सकते आप? आज तो दोनों बच्चों ने भी सुबह से कुछ नहीं खाया।”
रेवती को याद करते हुए मन मसोस कर रह गए! तर्पण आदि करते हुए डेढ़ बज गए। बाहर की हलचल पर ध्यान केन्द्रित किया।
“यजमान! आपकी माताजी की कोई इच्छा अधूरी रह गई है, कोई कौवा भोजन छू भी नहीं रहा। उनकी अधूरी इच्छा पूरी करने का प्रण कीजिए।”
विशाल और वैदेही एक दूसरे को देख रहे हैं। क्या इच्छा रही होगी?
अचानक छोटा बेटा बोल पड़ा, “पापा कौआ नहीं खा रहा तो क्या हुआ, दादाजी को तो खिला दो । सुबह से भूखे बैठे हैं। अब तो मुझसे भी भूख सहन नहीं हो रही । मुझे भी खाना खाना है।”
धीरे धीरे चलते हुए बाहर आए दीनानाथ जी।
“बेटा रेवती ने हमेशा मुझे खिलाकर खाया,शायद आज भी…”आगे के शब्द गले में ही अटक गए।
उनके इतना कहते ही बहू बेटे के भाव एकाएक बदले और उनकी आँखों में पश्चाताप के आँसू बहने लगे।
“पापा, सॉरी ! माँ अब नहीं हैं, उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की लालसा में हम आपको बिल्कुल ही भुला बैठे।”
आँखों के आँसू पोंछते हुए विशाल ने जैसे ही एक कौर पिताजी की ओर बढ़ाया, उसे महसूस हुआ जैसे बाहर केले के पत्ते पर रखे भोजन पर अनेक कौवे काँव-काँव कर मँडराने लगे हैं..!!

